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दो दशकों की राजनीति, एक पीढ़ी की स्मृतियां और अब नया मोड़… नीतीश युग के बाद बिहार किस दिशा में जाएगा?

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पटना: बिहार की राजनीति इन दिनों एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी दिखाई दे रही है। करीब दो दशकों तक राज्य की सत्ता की धुरी रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के साथ ही एक ऐसा अध्याय समाप्ति की ओर बढ़ता दिख रहा है, जिसने बिहार की एक पूरी पीढ़ी के राजनीतिक और सामाजिक अनुभवों को आकार दिया। यही कारण है कि आज जब यह चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार सक्रिय रूप से राज्य की सत्ता से दूर जा सकते हैं, तो बिहार के लोगों के बीच एक भावनात्मक और राजनीतिक सवाल भी उभर रहा है—अब आगे क्या होगा?
बिहार के समाज में एक बड़ी आबादी ऐसी है, जिसकी उम्र आज 40 से 50 वर्ष के बीच है। इस पीढ़ी ने 1990 के दशक का वह दौर भी देखा है जब राज्य की छवि अराजकता, अपराध और अव्यवस्था से जुड़ी रही। वहीं इसी पीढ़ी ने 2005 के बाद का वह समय भी महसूस किया जब शासन व्यवस्था में बदलाव की शुरुआत हुई और विकास, कानून व्यवस्था तथा सामाजिक योजनाओं को लेकर नई दिशा दिखाई देने लगी। यही वजह है कि आज कई लोग यह कहते सुनाई देते हैं कि उन्हें “नीतीश की आदत” हो गई है।
दरअसल, बिहार का सामाजिक-राजनीतिक इतिहास 1990 से 2005 के बीच के समय को अक्सर उथल-पुथल और चुनौतियों के दौर के रूप में याद करता है। उस समय अपहरण, अपराध और जातीय तनाव की घटनाएं अक्सर चर्चा में रहती थीं। कई परिवारों के लिए शाम ढलते ही घर से बाहर निकलना भी चिंता का विषय बन जाता था। शिक्षा और रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में युवाओं का पलायन भी उस दौर की बड़ी पहचान बना।
लेकिन 2005 में जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला तो राज्य की राजनीति में एक अलग तरह की पहल देखने को मिली। उनकी सरकार ने कानून व्यवस्था सुधारने के लिए कई कदम उठाए। स्पीडी ट्रायल की व्यवस्था लागू की गई, जिसके तहत बड़ी संख्या में अपराधियों को सजा दिलाई गई। प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और पुलिस तंत्र को सक्रिय बनाने पर जोर दिया गया।
विकास के मोर्चे पर भी राज्य में कई योजनाओं की शुरुआत हुई। ग्रामीण सड़कों का बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया और हजारों पुल-पुलियों का निर्माण कराया गया, जिससे दूर-दराज के इलाकों को मुख्य शहरों से जोड़ने में मदद मिली। बिजली आपूर्ति में भी व्यापक सुधार हुआ और धीरे-धीरे गांव-गांव तक बिजली पहुंचाने की दिशा में काम किया गया।
सामाजिक न्याय और भागीदारी को लेकर भी कई पहलें सामने आईं। महादलित और अत्यंत पिछड़े वर्गों के लिए विशेष योजनाएं शुरू की गईं ताकि समाज के सबसे कमजोर तबकों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंच सके। पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू कर राजनीतिक भागीदारी का दायरा बढ़ाया गया, जिसका असर यह हुआ कि बड़ी संख्या में महिलाएं स्थानीय शासन में प्रतिनिधि बनकर सामने आईं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी कई बदलाव देखने को मिले। मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना जैसी पहल ने ग्रामीण इलाकों की लड़कियों को स्कूल तक पहुंचने में नई सुविधा दी। इसका असर माध्यमिक स्तर पर छात्राओं के नामांकन में बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। शिक्षा के क्षेत्र में यह कदम सामाजिक बदलाव का प्रतीक माना गया, क्योंकि इससे हजारों परिवारों में बेटियों की पढ़ाई को लेकर नई सोच विकसित हुई।
स्वास्थ्य, पेयजल और स्वच्छता के क्षेत्र में भी कई योजनाओं को लागू किया गया। ‘हर घर नल का जल’ जैसी पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधा बढ़ाने की कोशिश हुई, जबकि शौचालय निर्माण और स्वच्छता अभियानों के माध्यम से स्वास्थ्य और जीवन स्तर सुधारने का प्रयास किया गया।
इसी दौरान वर्ष 2016 में बिहार सरकार ने पूर्ण शराबबंदी लागू करने का निर्णय लिया। यह फैसला राज्य की राजनीति और समाज दोनों में व्यापक बहस का विषय बना। सरकार का तर्क था कि शराबबंदी से परिवारों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी और घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं में कमी आएगी। कई महिला समूहों ने इस निर्णय का समर्थन भी किया, हालांकि इसके साथ अवैध शराब के कारोबार और राजस्व घाटे को लेकर आलोचनाएं भी सामने आईं।
करीब बीस वर्षों के इस लंबे राजनीतिक दौर में बिहार ने कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन एक बात स्पष्ट रही कि राज्य की राजनीति का केंद्र लंबे समय तक नीतीश कुमार ही रहे। यही वजह है कि आज जब उनके सक्रिय नेतृत्व से हटने की संभावना सामने आई है, तो राजनीतिक हलकों के साथ-साथ आम लोगों के बीच भी भविष्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार अब एक नए राजनीतिक चरण में प्रवेश करने जा रहा है, जहां नई नेतृत्व शैली और नई प्राथमिकताएं उभर सकती हैं। लेकिन इसके साथ यह भी तय माना जा रहा है कि पिछले दो दशकों का अनुभव राज्य की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बना रहेगा।
बिहार की उस पीढ़ी के लिए, जिसने एक दौर में भय और असुरक्षा का माहौल देखा और बाद में बदलाव की प्रक्रिया को महसूस किया, यह समय किसी ऐतिहासिक मोड़ से कम नहीं है। आने वाले वर्षों में राज्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह तो राजनीति और नेतृत्व तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि नीतीश कुमार के लंबे शासनकाल की तुलना और चर्चा बिहार की राजनीति में लंबे समय तक बनी 

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